संवाददाता: अशोक सोनी। बरेली

खैरी मुग़ली में चल रहे लक्ष्मी नारायण यज्ञ एवं श्री राम कथा द्वितीय दिवस राम कथा के माहाम्य की कथा का वर्णन करते हुए देवी रत्नमणि ने कहा कि
निंदा अर्थात (दूसरों की बुराई करना) आध्यात्मिक और मानसिक रूप से हानिकारक है, क्योंकि यह व्यक्ति के संचित पुण्य कर्मों को नष्ट कर देती है और आत्मा को अशुद्ध करती है।
यह एक ऐसा अवगुण है जो न केवल आपसी विश्वास और प्रेम को तोड़ता है, बल्कि निंदा करने वाले के व्यक्तित्व में ईर्ष्या और अविश्वास जैसे नकारात्मक भावों को भी बढ़ाता हैं
निंदा से पुण्य के नष्ट होने से पुण्य का हस्तांतरण हो जाता है आध्यात्मिक महापुरुषों की मान्यताओं के अनुसार, जब आप किसी की निंदा करते हैं।
तो आपके द्वारा किए गए पुण्यों का फल उस व्यक्ति को मिल जाता है, और आप उसके पापों के भागी बन जाते हैं।
साथ ही आत्मिक पतन का कारण भी निंदा करने से होता है, विशेषकर भगवान या संतों की, सबसे बड़ा पाप माना जाता है, जो मानसिक शांति को भंग कर देता है।
बार-बार किसी के अवगुणों की निंदा करने से, धीरे-धीरे वे अवगुण निंदा करने वाले के अंदर भी घर करने लगते हैं ।
और समय और ऊर्जा की बर्बादी होती है यह केवल नकारात्मकता पैदा करती है।
व्यक्ति के अमूल्य समय को नष्ट करती है अतः भगवान के भक्त और साधकों को कभी किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए।
कथा के दौरान उन्होंने आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व की अनेक कथाओं के द्वारा श्रद्धालुओं को भावविभोर किया।
कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हुए
