संवाददाता: अशोक सोनी। बरेली

सीएम हेल्पलाइन में खराब प्रदर्शन पर वेतन कटौती की नौबत, तहसीलदारों से लेकर विभाग प्रमुखों तक पर कार्रवाई।
नर्मदापुरम : कलेक्टर सोमेश मिश्रा की समीक्षा बैठक में जिले की प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है। जिस सीएम हेल्पलाइन को जनता और सरकार के बीच भरोसे का पुल माना जाता है, उसी में कई विभाग लगातार फिसड्डी साबित हो रहे हैं।
स्थिति इतनी गंभीर बताई गई कि अधिकारियों को सात दिन के वेतन की राशि रेडक्रॉस सोसायटी में जमा कराने के नोटिस जारी करने के निर्देश देने पड़े। सवाल यह है कि जब कार्रवाई की नौबत आ गई, तब तक जिम्मेदार अधिकारी कर क्या रहे थे?
ऊर्जा विभाग, नागरिक आपूर्ति निगम, जिला चिकित्सालय, कृषि विभाग, सहकारिता विभाग और शिक्षा विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभागों की रैंकिंग पर कलेक्टर ने नाराजगी जताई।
कलेक्टर के तेवर से कांपा प्रशासन! क्या अब जागेंगे सुस्त अफसर?
ये वही विभाग हैं जिनसे आम जनता का रोज का सरोकार है। बिजली, खाद, इलाज और शिक्षा जैसी मूलभूत सेवाओं से जुड़े विभाग यदि शिकायतों का समाधान नहीं कर पा रहे हैं, तो इसका खामियाजा आखिर कौन भुगत रहा है?
तहसील स्तर की समीक्षा भी संतोषजनक नहीं रही। कई तहसीलों की रैंकिंग ‘ए’ श्रेणी से नीचे पाई गई। सीमांकन जैसे राजस्व मामलों में भी सुस्ती सामने आई, जिसके चलते तहसीलदारों पर जुर्माने और एसडीएम को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए गए।
आखिर जनता की शिकायतें समय पर क्यों नहीं सुलझ रहीं?
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन केवल नोटिस और जुर्मानों के सहारे व्यवस्था सुधारना चाहता है, या फिर जमीनी स्तर पर कामकाज की असली खामियों को दूर करने की भी कोई योजना है?
बैठक में खाद वितरण की समीक्षा के दौरान भी दूरस्थ क्षेत्रों में खाद उपलब्ध कराने के लिए विशेष कार्ययोजना बनाने के निर्देश देने पड़े। यानी मानसून सिर पर है, खेती का मौसम शुरू हो चुका है, लेकिन व्यवस्था को अभी भी योजना बनाने की जरूरत पड़ रही है।
रैंकिंग में फिसड्डी, शिकायतों में ढिलाई आखिर किस बात की तनख्वाह ले रहे हैं अधिकारी?
बाढ़ नियंत्रण को लेकर भी कलेक्टर ने अलग से निर्देश दिए। नालों-नालियों की सफाई, नियंत्रण कक्ष सक्रिय रखने और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर जोर देना पड़ा। यह सवाल भी उठता है कि क्या ये तैयारियां समय रहते हो चुकी होतीं तो बार-बार निर्देश देने की जरूरत पड़ती?
दिलचस्प बात यह है कि बैठक में प्राचीन पांडुलिपियों को डिजिटाइज करने जैसे सांस्कृतिक संरक्षण के विषय पर भी चर्चा हुई। लेकिन जनता शायद यह जानना ज्यादा चाहती है कि उसकी शिकायतों का डिजिटलीकरण तो हो रहा है, पर समाधान कब होगा?
नोटिस पर नोटिस, जुर्माने पर जुर्माना , क्या नर्मदापुरम का प्रशासन शिकायतों से हार गया?
नर्मदापुरम की इस समीक्षा बैठक ने एक बार फिर दिखा दिया कि कागजों में योजनाएं बहुत हैं, लेकिन जमीनी अमल में कहीं न कहीं बड़ी कमी है। वरना एक साथ इतने विभागों, तहसीलों और अधिकारियों पर कार्रवाई की जरूरत ही क्यों पड़ती?
क्योंकि सवाल केवल अधिकारियों के वेतन का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जिसके भरोसे जनता अपनी शिकायत दर्ज कराती है और समाधान की उम्मीद करती है। जब वही व्यवस्था नोटिसों के सहारे चलती दिखाई दे, तो चिंता होना स्वाभाविक है।
