बच्चों संग भटकने को मजबूर पीड़िता
संवाददाता: रितिक जैन। बाड़ी

रातापानी अभ्यारण विस्थापन पर गंभीर सवाल, नियमों की अनदेखी का आरोप, कलेक्टर से लेकर विभागों तक गुहार बेअसर
रायसेन जिले के औबेदुल्लागंज स्थित रातापानी अभ्यारण के अंतर्गत वन ग्राम नीलगढ़ और धुनवानी में चल रही विस्थापन प्रक्रिया अब विवादों में घिरती नजर आ रही है।
यहां एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है।
ग्राम नीलगढ़ निवासी श्रीमती मधु केवट, पति मोहर सिंह केवट—जो सभी शासकीय मापदंडों के अनुसार पात्र बताई जा रही हैं—उन्हें विस्थापन सूची से बाहर कर दिया गया है।
परिणामस्वरूप वह अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
नियमों के बावजूद क्यों वंचित ?
विस्थापन प्रक्रिया वन अधिकार अधिनियम 2006 (Forest Rights Act), राष्ट्रीय पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति एवं राज्य शासन के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के तहत की जाती है, जिसमें यह प्रावधान है कि—
- मूल निवासी एवं वन भूमि पर आश्रित परिवारों को प्राथमिकता दी जाए
- पात्रता का निर्धारण पारदर्शी एवं निष्पक्ष जांच के आधार पर हो
- प्रत्येक पात्र परिवार को पुनर्वास, मुआवजा एवं वैकल्पिक भूमि का अधिकार मिले
पीड़िता का दावा है कि उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज—समग्र आईडी, आधार, वोटर आईडी, निवासी एवं जाति प्रमाण पत्र, पंचायत पंचनामा—समय पर प्रस्तुत किए, जो उनकी पात्रता को स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं।
इसके बावजूद उन्हें सूची से बाहर करना नियमों की खुली अवहेलना माना जा रहा है।
जनसुनवाई से लेकर दफ्तर-दफ्तर तक—नहीं मिला न्याय
श्रीमती केवट ने कई बार जनसुनवाई में आवेदन देकर कलेक्टर रायसेन, वन विभाग, राजस्व विभाग एवं एसडीएम कार्यालय तक अपनी बात रखी, लेकिन हर बार उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।
पीड़िता का कहना है कि “प्रशासनिक दरवाजे खटखटाते-खटखटाते अब उम्मीद टूटने लगी है।”
जांच पर भी उठे सवाल
महिला ने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा किया गया निरीक्षण निष्पक्ष नहीं था, बल्कि द्वेषपूर्ण रवैये के चलते उन्हें अपात्र घोषित कर दिया गया।
उन्होंने मांग की है कि—
- मामले की पुनः स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए
- जांच प्रक्रिया में ग्राम पंचायत व स्थानीय प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए
- पूरी सूची को सार्वजनिक किया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे
“पात्र बाहर, अपात्र अंदर”—गंभीर आरोप
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि जहां वास्तविक पात्रों को सूची से बाहर किया जा रहा है, वहीं अपात्र व्यक्तियों को लाभ दिया जा रहा है।
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही बल्कि भ्रष्टाचार की ओर भी इशारा करता है।
बच्चों के साथ असुरक्षित जीवन
आज स्थिति यह है कि श्रीमती केवट अपने बच्चों के साथ बिना किसी स्थायी व्यवस्था के जीवन यापन कर रही हैं।
विस्थापन के नाम पर जहां लोगों को सुरक्षित भविष्य मिलना चाहिए, वहीं यह परिवार अधिकारों से वंचित होकर संकट में है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी ?
रेंजर शिव कुमार गुर्जर के अनुसार,
“नीलगढ़ में विस्थापन कार्य जारी है। संबंधित महिला को पहले पात्रता निर्धारण समिति में विचाराधीन रखा गया था, लेकिन बाद में उन्हें अपात्र घोषित किया गया।
यह मामला जिला पात्रता निर्धारण समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है।”
बड़ा सवाल_?
क्या विस्थापन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी कर मनमानी की जा रही है?
क्या पात्र गरीबों का हक छीनकर किसी और को फायदा पहुंचाया जा रहा है?
आखिर कब मिलेगा इस पीड़ित परिवार को न्याय?
