संवाददाता: अशोक सोनी। बरेली

नर्मदापुरम के नतीजों में दिखी एक अफसर की छाप, बच्चों ने कहा मैडम आती थीं, तो पढ़ाई सच में शुरू होती थी
नर्मदापुरम में आज जब रिजल्ट आया, तो आंकड़ों की चमक से ज़्यादा आवाज़ उन बच्चों की थी, जो नंबर गिनाने से पहले एक नाम ले रहे थे।
ये थोड़ा असामान्य है, क्योंकि आमतौर पर रिजल्ट के दिन बच्चे अपनी मेहनत, कोचिंग या किस्मत की बात करते हैं। लेकिन यहां कहानी थोड़ी अलग है।
बच्चे कह रहे हैं जब मैडम आती थीं, तो डर लगता था लेकिन वही डर हमें पढ़ने पर मजबूर करता था।
अब सवाल ये है कि क्या शिक्षा व्यवस्था को चलाने के लिए डर ज़रूरी है, या जिम्मेदारी? और अगर जिम्मेदारी ही असली चीज़ है, तो वो पहले क्यों नहीं दिखी?
पूर्व कलेक्टर सोनिया मीणा का नाम आज इसलिए लिया जा रहा है क्योंकि उन्होंने उस सिस्टम को छेड़ा, जिसे अक्सर फाइलों में ही अच्छा मान लिया जाता है।
स्कूलों में अचानक पहुंच जाना, क्लास में बैठ जाना, कॉपियां उठाकर देखना ये सब काम सुनने में छोटे लगते हैं, लेकिन असल में यही वो चीज़ें हैं जो सिस्टम को हिलाती हैं।
कितनी बार ऐसा होता है कि अधिकारी आते हैं, चाय पीते हैं, रजिस्टर देखते हैं और चले जाते हैं। सब कुछ ठीक लिखा रह जाता है। लेकिन यहां ठीक को सच में ठीक करने की कोशिश हुई।
शिक्षकों से सवाल हुए, बच्चों से जवाब मांगे गए, और सबसे अहम रिवीजन को आदत बनाया गया, औपचारिकता नहीं।
बच्चों की बातों में एक बात बार-बार सुनाई देती है बार-बार टेस्ट होते थे तैयारी करनी पड़ती थी।
यानी पढ़ाई अब सिर्फ साल के अंत की चीज़ नहीं रही, रोज़ की जिम्मेदारी बन गई।
तो क्या ये मान लिया जाए कि सिस्टम पहले सो रहा था?
और अगर एक कलेक्टर के आने से इतना फर्क पड़ सकता है, तो बाकी जगहों पर क्यों नहीं पड़ता?
नर्मदापुरम का ये रिजल्ट सिर्फ पास-फेल का आंकड़ा नहीं है। ये एक सवाल है क्या हर जिले को ऐसी ही सख्ती, ऐसी ही निगरानी और ऐसा ही इरादा चाहिए?
क्योंकि बच्चे तो हर जगह एक जैसे होते हैं फर्क सिर्फ इतना होता है कि उन्हें जगाने वाला कोई होता है या नहीं।
