संवाददाता: अशोक सोनी। बरेली

क्या पिपरिया विधानसभा को मिल गया कांग्रेस का राजनीतिक ब्रह्मास्त्र ? राजा भैया पलिया की एंट्री ने बढ़ाई सियासी धड़कनें!
पिपरिया की राजनीति को अगर आपने करीब से देखा है, तो आप जानते होंगे कि यहां चुनाव सिर्फ वोटों से नहीं जीते जाते यहां चुनाव माहौल से जीते जाते हैं। यहां चेहरे सिर्फ पोस्टरों पर नहीं बनते लोगों की बातचीत में बनते हैं। और इन दिनों पिपरिया की राजनीति में एक नाम धीरे-धीरे उसी तरह उभरता दिखाई दे रहा है राजा भैया पलिया।
अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या है इस नाम में कि गांव की चौपालों से लेकर कांग्रेस के भीतर तक चर्चा लगातार तेज होती जा रही है? क्यों युवा, कार्यकर्ता और राजनीतिक हलकों में लोग यह पूछने लगे हैं कि क्या कांग्रेस इस बार कोई बड़ा दांव खेलने जा रही है?
राजनीति में कुछ लोग बहुत दिखाई देते हैं, लेकिन असर कम छोड़ते हैं। और कुछ लोग कम दिखाई देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे पूरी राजनीति का केंद्र बन जाते हैं। राजा भैया पलिया फिलहाल उसी दूसरी श्रेणी में नजर आते हैं।
उन्होंने कभी आक्रामक प्रचार की राजनीति नहीं की। ना हर मोड़ पर पोस्टर लगाए, ना रोज बयान दिए, ना भीड़ दिखाने की राजनीति की। लेकिन इसके बावजूद उनका नाम लगातार मजबूत होता गया। राजनीति के जानकार बताते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति और अंदरूनी गतिविधियों में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। वे सामने भले कम दिखाई दिए हों, लेकिन संगठन के भीतर उनकी सक्रियता लगातार चर्चा में रही।
राजा भैया की एक अलग पहचान युवाओं के बीच भी बनी।
आरसीसी बनखेड़ी क्रिकेट टीम के जरिए गांव-गांव तक उनका संपर्क पहुंचा। क्रिकेट के मैदान से शुरू हुआ यह जुड़ाव अब सामाजिक और राजनीतिक पहचान में बदलता दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि उनका नाम सिर्फ नेताओं की बैठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गया।
पिपरिया में भाजपा का मजबूत ढांचा जरूर है और डब्लू भाई की राजनीतिक पकड़ भी किसी से छिपी नहीं। लेकिन राजनीति में सिर्फ संगठन नहीं चलता, माहौल भी चलता है। और इस समय कांग्रेस समर्थकों के बीच जो माहौल बनता दिखाई दे रहा है, उसमें राजा भैया का नाम तेजी से ऊपर उठ रहा है।
सबसे बड़ी बात यह मानी जा रही है कि वे टकराव की राजनीति से दूर रहे। पिछले कई वर्षों में उन्होंने विवादों से दूरी बनाकर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई। शायद यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर भी उन्हें लेकर विरोध कम और संभावनाएं ज्यादा दिखाई देती हैं।
हालांकि राजनीति में रास्ते कभी आसान नहीं होते
कांग्रेस में टिकट की दौड़ हमेशा जटिल रही है। पुराने नेताओं की वापसी, गुटबाजी और अंदरूनी समीकरण किसी भी नए चेहरे की राह मुश्किल बना सकते हैं। लेकिन राजनीति का एक सच यह भी है कि जब जनता खुद किसी नाम की चर्चा करने लगे, तब राजनीतिक दलों को भी उस नाम पर गंभीरता से विचार करना पड़ता है।
पिपरिया में इस समय हवा पूरी तरह बदली तो नहीं है, लेकिन हलचल जरूर दिखाई दे रही है। और राजनीति में कई बार सबसे बड़ा बदलाव शोर से नहीं ऐसी ही धीमी आहटों से शुरू होता है।
