तेंदूपत्ता खरीदी में गरीब मजदूरों पर “कटौती” का शिकंजा!
संवाददाता : रितिक जैन। बाड़ी

बाड़ी कला में मजदूरों का फूटा गुस्सा • कैमरे के सामने खोली खरीदी केंद्र की पोल
मौके से नदारद मिला वन विभाग • सवालों में ठेकेदारों की भूमिका
रायसेन जिले के बाड़ी कला में चल रही तेंदूपत्ता खरीदी अब बड़े सवालों के घेरे में आ गई है। जंगलों में तपती धूप और जान जोखिम में डालकर तेंदूपत्ता तोड़ने वाले गरीब मजदूरों ने खरीदी केंद्र पर खुली मनमानी, दबाव और शोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं। मजदूरों का कहना है कि 100 गड्डियों के साथ 5 गड्डियां अतिरिक्त देने का दबाव बनाया जाता है और यदि कोई मजदूर अतिरिक्त गड्डियां देने से मना कर दे तो उसके पत्तों की गिनती तक रोक दी जाती है।
मजदूरों का गुस्सा खुलकर आया सामने।
मौके पर पहुंचे मीडिया दल के सामने मजदूरों का गुस्सा खुलकर सामने आया। मजदूरों ने आरोप लगाया कि “मेहनत हमारी, जंगल हमारा, पसीना हमारा… लेकिन कटौती कोई और कर रहा है।” कई मजदूरों ने कहा कि विरोध करने वालों को घंटों बैठाकर रखा जाता है और खरीदी प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की जाती है ताकि मजदूर दबाव में आ जाएं।
जानकारी के अनुसार शासन द्वारा निर्धारित दर के हिसाब से 100 गड्डियों पर करीब ₹400 मजदूरी बनती है। ऐसे में यदि 5 गड्डियां अतिरिक्त ली जा रही हैं तो यह सीधे गरीब मजदूरों की मजदूरी पर डाका माना जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि तेंदूपत्ता सीजन में मजदूर दिनभर जंगलों में मेहनत करते हैं और शाम को खरीदी केंद्र पर पहुंचने के बाद उन्हें “फ्री गड्डियां” देने का दबाव झेलना पड़ता है।
सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब मीडिया टीम ने खरीदी केंद्र का निरीक्षण किया। पूरे केंद्र पर वन विभाग का एक भी अधिकारी या कर्मचारी मौजूद नहीं मिला। इससे यह सवाल और गहरा गया कि आखिर खरीदी व्यवस्था की निगरानी कौन कर रहा है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरा सिस्टम ठेकेदार और उसके कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दिया गया है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कागजों में निगरानी दिखा रहे हैं।
क्या कहना हैं _ ठेकेदार का
वहीं मौके पर मौजूद ठेकेदार पक्ष ने सभी आरोपों को गलत बताया। ठेकेदार का कहना था कि खरीदी पूरी तरह नियमों के अनुसार की जा रही है और किसी भी मजदूर से अतिरिक्त गड्डियां नहीं ली जा रही हैं। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि ठेकेदार के बयान के दौरान ही वहां खड़े मजदूरों ने सीधे तौर पर अतिरिक्त गड्डियां लेने के आरोप दोहरा दिए। इससे मौके पर माहौल तनावपूर्ण हो गया और खरीदी व्यवस्था की सच्चाई पर कई सवाल खड़े हो गए।
मामले को लेकर बाड़ी रेंजर जितेन तोमर से दूरभाष पर चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि शिकायत की जांच करवाई जाएगी और यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जाएगी।
अब बड़ा सवाल यह है_
आखिर जंगलों में पसीना बहाने वाले गरीब मजदूरों की मेहनत पर “कटौती” का यह खेल किसके संरक्षण में चल रहा है? जब खरीदी केंद्रों से विभागीय अमला गायब है तो क्या पूरा सिस्टम ठेकेदारों के भरोसे चल रहा है? और यदि मजदूरों के आरोप सही हैं तो अतिरिक्त गड्डियों का फायदा आखिर किसकी जेब में पहुंच रहा है?
