संवाददाता : रितिक जैन। बाड़ी
सड़क, पुलिया, चबूतरा, लाइट, पानी और आवास के नाम पर लाखों खर्च… लेकिन खमरिया सोहनपुर, घोंटी और घोटीबेहरा में नहीं दिखा काम

बाड़ी जनपद के दूरस्थ गांवों तक टीम ने पहुंचकर जमीनी स्थिति देखी
बाड़ी मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर जंगलों और उबड़-खाबड़ कच्चे रास्तों के बीच बसे खमरिया सोहनपुर, घोंटी और घोटीबेहरा गांवों तक पहुंचना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।
कई किलोमीटर तक मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता और रास्ते इतने खराब हैं कि सामान्य वाहन भी आसानी से नहीं पहुंच पाते, लेकिन टीम जब इन सभी मुश्किलों को पार करते हुए गांव के अंदर पहुंची तो जो स्थिति सामने आई वह बेहद चौंकाने वाली थी।
क्योंकि गांव में बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव नजर आया, ना पक्की सड़क, ना पानी, ना रोशनी, जबकि सरकारी कागजों में यही गांव पूरी तरह विकसित दिखाए गए।

स्ट्रीट लाइट में बड़ा खेल- लाइट के नाम पर लाखों खर्च, लेकिन गांव अंधेरे में
खमरिया सोहनपुर गांव में LED स्ट्रीट लाइट लगाने के नाम पर एक ही फर्म को अलग-अलग तारीखों में करीब 99 हजार रुपए के कई बिलों के माध्यम से भुगतान किया गया।
लाखों रुपए की राशि कागजों में खर्च दिखा दी गई, लेकिन जब मौके पर जाकर देखा गया तो गांव में स्ट्रीट लाइट का कोई स्पष्ट प्रभाव नजर नहीं आया।
ग्रामीणों का कहना है कि रात में पूरा गांव अंधेरे में डूबा रहता है, जिससे साफ होता है कि खर्च तो हुआ लेकिन उसका लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंचा।

चबूतरा और पुलिया निर्माण पर सवाल
ग्राम घोंटी में हनुमान मंदिर के पास चबूतरा निर्माण के लिए 81 हजार रुपए स्वीकृत कर भुगतान कर दिया गया, लेकिन मौके पर कोई मजबूत और स्पष्ट निर्माण नजर नहीं आया।
वहीं घोटीबेहरा में पुलिया निर्माण के नाम पर करीब 3 लाख 17 हजार रुपए स्वीकृत किए गए और अलग-अलग फर्मों के नाम पर भुगतान किया गया।
लेकिन जमीन पर पुलिया का कोई स्पष्ट और ठोस निर्माण नजर नहीं आया, जिससे यह संदेह और गहरा जाता है कि कागजों में काम दिखाकर राशि निकाल ली ।
सड़क निर्माण में गड़बड़ी
लाखों खर्च, लेकिन सड़क का नामोनिशान नहीं
सीसी सड़क निर्माण के नाम पर भी लाखों रुपए खर्च दिखाए गए, सुप्यार सिंह के मकान से गोविंद सिंह के मकान तक और अशिल के मकान की ओर सड़क निर्माण के लिए अलग-अलग फर्मों को भुगतान किया गया।
लेकिन जब टीम ने मौके पर जाकर देखा तो कई जगह सड़क का कोई अस्तित्व ही नहीं मिला, कहीं अधूरी तो कहीं पूरी तरह गायब, जिससे यह मामला और गंभीर हो जाता है।
नल-जल योजना पूरी तरह फेल
पाइपलाइन बिछी, लेकिन पानी नहीं
भीषण गर्मी के बीच सबसे बड़ी समस्या पानी की है, गांवों में नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन तो 2 से 3 साल पहले बिछाई गई।
लेकिन आज तक इन पाइपों में पानी नहीं आया, नल सूखे पड़े हैं और ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ रहा है।
महिलाएं और बच्चे रोजाना इस संकट से जूझ रहे हैं, जिससे यह योजना पूरी तरह विफल नजर आती है।
आवास योजना भी बेअसर
कच्चे घरों में रहने को मजबूर लोग
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हर गरीब को पक्का मकान देने का दावा किया गया है, लेकिन इन गांवों में कई परिवार आज भी कच्चे और जर्जर मकानों में रहने को मजबूर हैं।
बारिश के समय घर गिरने का खतरा बना रहता है, गर्मी में घर तपते हैं और सर्दी में ठंड से बचाव नहीं हो पाता, ग्रामीणों का कहना है कि पात्र होने के बावजूद उन्हें योजना का लाभ नहीं मिला।
स्वास्थ्य सेवाएं ठप
भवन बने, लेकिन ताले में बंद
घोंटी क्षेत्र में शासकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में शासकीय उचित मूल्य दुकान संचालित होने की जानकारी सामने आई है, जो नियमों पर सवाल खड़े करती है।
वहीं यह दुकान लंबे समय से बंद पड़ी बताई जा रही है, जिससे ग्रामीणों को राशन जैसी मूलभूत सुविधा भी समय पर नहीं मिल रही।
इसके अलावा घोंटी और घोटीबेहरा क्षेत्र में बने आयुष्मान आरोग्य मंदिर यानी उप स्वास्थ्य केंद्र की नई इमारतें ताले में बंद मिलीं।
जबकि इनका उद्देश्य ग्रामीणों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं, दवाइयां और जांच की सुविधा उपलब्ध कराना होता है, लेकिन यहां यह पूरी व्यवस्था ठप नजर आई।
गांव में मूलभूत सुविधाओं का अभाव
ना नेटवर्क, ना इलाज, ना सुविधा
गांवों में ना मोबाइल नेटवर्क की सुविधा है, ना नियमित बिजली आपूर्ति, अगर कोई बीमार हो जाए तो उसे करीब 40 किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है।
108 एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती, आंगनबाड़ी केंद्र बंद पड़ा है और सार्वजनिक शौचालयों पर ताले लगे हैं, जिससे यह साफ होता है कि ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
ग्रामीणों के आरोप
मिलीभगत से निकाला गया पैसा
ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच और सचिव की मिलीभगत से योजनाओं के नाम पर पैसा निकाला गया, अलग-अलग फर्मों के नाम पर छोटे-छोटे बिल बनाकर भुगतान किया गया, लेकिन जमीन पर काम नहीं हुआ, जिससे यह पूरा मामला और गंभीर हो जाता है।
प्रशासन का पक्ष
बाड़ी जनपद के सीईओ दानिश खान का कहना है कि मामले को गंभीरता से लिया गया है और एक टीम गठित की जा रही है, जो गांव-गांव जाकर सर्वे करेगी, और जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे उनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
बड़ा सवाल
जब कागजों में लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं तो जमीन पर विकास क्यों नहीं दिखता, क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?
