संवाददाता: अशोक सोनी। बरेली

एक तरफ सरकार सोलर पैनलों की मजबूती के दावे करती है—जो आंधी-तूफान में भी डटे रहते हैं, और दूसरी तरफ वेयरहाउस की छतें हैं जो पहली तेज हवा में ही “आजादी” का जश्न मनाने लगती हैं।
सवाल सीधा है—जब छत ही उड़ जाए, तो अंदर रखा हजारों क्विंटल अनाज आखिर किसके भरोसे?
शनिवार को शाम अचानक मौसम ने करवट बदली और तेज आंधी-तूफान के साथ बारिश ने जिलेभर में हड़कंप मचा दिया।
बरेली के पास छुछार गांव स्थित हरशिव वेयरहाउस में तो हालात और भी बदतर हो गए, जहां तेज हवा ने छत को ही उड़ा दिया।
हजारों क्विंटल अनाज “भगवान भरोसे”
करीब 5000 मैट्रिक टन क्षमता वाले इस वेयरहाउस में रखी सरकारी मूंग अब खुले आसमान के नीचे भीगती नजर आई। कुछ ही मिनटों की बारिश ने किसानों की मेहनत को पानी-पानी कर दिया।
कटाक्ष यही है—वेयरहाउस का मतलब होता है “सुरक्षित भंडारण”, लेकिन यहां तो सुरक्षा पहले ही उड़ चुकी थी, छत के साथ।
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि:
क्या वेयरहाउस में अनाज रखने से पहले अधिकारी मौके का निरीक्षण नहीं करते?
क्या छत की गुणवत्ता और संरचना की जांच सिर्फ कागजों में ही पूरी हो जाती है?
और अगर सब कुछ “मानकों के अनुसार” था, तो फिर पहली आंधी में ही छत क्यों उड़ गई?
खरीदी केंद्रों पर अफरा-तफरी
जिलेभर में तेज बारिश के कारण खरीदी केंद्रों पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। खुले में रखे किसानों के अनाज भी भीग गए, जिससे सरकारी खरीदी पर भी असर पड़ना तय है।
किसानों की मेहनत फिर सवालों में
किसान पहले ही मौसम की मार झेल रहे हैं, ऊपर से व्यवस्थाओं की लापरवाही ने उनकी परेशानी दोगुनी कर दी। जिन अनाज को सुरक्षित रखने के लिए वेयरहाउस बनाए गए, वही अब सबसे कमजोर कड़ी साबित हो रहे हैं।
यहां सोलर पैनल नहीं उड़ते, लेकिन वेयरहाउस की छत जरूर उड़ जाती है। शायद इसलिए क्योंकि सोलर पैनल “ऊर्जा” देते हैं और वेयरहाउस सिर्फ “कागजी व्यवस्था” का सहारा लेते हैं।
अब देखना यह है कि जिम्मेदारी तय होती है या फिर हर बार की तरह यह मामला भी “जांच जारी है” के फाइलों में दफन हो जाता है।
