संवाददाता: अशोक सोनी। बरेली

चिलचिलाती गर्मी में दुल्हन हुई बेहोश
एक महीने पहले पंजीकरण, फिर भी वेदी कम—41° की गर्मी में बेहाल दूल्हा-दुल्हन, प्रशासन के अनुभव पर उठे सवाल
सरकारी योजनाएं भले ही जनता के टैक्स से चलती हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत ने एक बार फिर सिस्टम की पोल खोल दी।
सनातन धर्म में जहां पाणिग्रहण संस्कार को सबसे पवित्र और मुहूर्त-आधारित माना जाता है, वहीं इस बार राजनीति के साये ने इस परंपरा को ही झुलसा दिया।
कन्यादान विवाह योजना के तहत आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में सैकड़ों जोड़े फेरे लेने पहुंचे, लेकिन मुहूर्त बीतता रहा और मंच पर इंतजार का ‘ड्रामा’ चलता रहा।

वजह—सीएम के आगमन में देरी! नतीजा यह हुआ कि पवित्र बेला राजनीति की भेंट चढ़ गई।
41 डिग्री की तपती गर्मी में दूल्हा-दुल्हन हाथों में पंखे लेकर हवा करते नजर आए, तो वहीं बाराती और घराती भूख-प्यास से बेहाल होकर छांव ढूंढते रहे।
हालात ऐसे बने कि एक ही वेदी पर दो-दो जोड़ों को बिठाकर फेरे करवाने की नौबत आ गई—जिससे पूरे आयोजन की ‘पवित्रता’ पर ही सवाल खड़े हो गए।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब एक महीने पहले ही जोड़ों का पंजीकरण तय हो चुका था, तो आखिर वेदियों की संख्या कम क्यों पड़ी? और वो भी तब, जब संबंधित अधिकारियों को एक दशक से अधिक का अनुभव है ऐसे आयोजनों का!
लोगों में आक्रोश साफ दिखा—ये शादी थी या परीक्षा ? कई बारातियों ने कहा कि “सरकार की योजना में आए थे, लेकिन यहां तो भूखे-प्यासे तपना पड़ा।”
अब सवाल सीधा है—क्या सरकारी योजनाएं सिर्फ दिखावे के लिए हैं? या फिर ज़मीनी स्तर पर लापरवाही और राजनीतिक प्राथमिकताओं ने इन पवित्र आयोजनों को भी ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का मजाक बना दिया है?
जहां एक तरफ सरकार गरीब परिवारों के सहारे का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ ऐसी अव्यवस्थाएं उन दावों पर करारा तमाचा साबित हो रही हैं। अब देखना होगा—जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी ‘रिवाज’ की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा!
