संवाददाता : रितिक जैन। बाड़ी (रायसेन)

चारगांव में ‘कागजी विकास’ का सबसे बड़ा खेल उजागर
रायसेन जिले के बाड़ी जनपद की ग्राम पंचायत चारगांव में विकास के नाम पर ऐसा खेल सामने आया है, जिसने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लाखों रुपये की लागत से बनने वाली सीसी रोड को कागजों में पूरा दिखाकर भुगतान तक निकाल लिया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वहां सड़क का एक इंच भी निर्माण नहीं हुआ।
गांव आज भी कीचड़, गड्ढों और बदहाल रास्तों में जकड़ा हुआ है, जबकि फाइलों में विकास दौड़ रहा है।
यह मामला महज गड़बड़ी नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से सरकारी धन के दुरुपयोग का संकेत देता है, जिसमें जिम्मेदारों की भूमिका पर सवाल उठना तय है।

कागजों में विकास की रफ्तार, जमीन पर शून्य हकीकत
26 जनवरी 2026 को ग्राम पंचायत चारगांव में खुशीलाल प्रजापति के मकान से किशोरी आदिवासी के मकान तक सीसी रोड निर्माण के लिए ₹4,18,000 की राशि स्वीकृत की गई।
योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को पक्की सड़क की सुविधा देना था, ताकि आवागमन आसान हो सके और जीवन स्तर बेहतर हो।
लेकिन सरकारी दस्तावेजों में दर्ज जानकारी चौंकाने वाली है—12 अप्रैल 2026 को ₹2,30,400 की राशि “मां मीरा पाल ट्रेडर्स” के नाम पर भुगतान कर दी गई।
सवाल सीधा है—जब सड़क बनी ही नहीं, तो आखिर किस आधार पर लाखों रुपये जारी कर दिए गए?

ग्राउंड जीरो की हकीकत: सड़क नहीं, सिर्फ दलदल और धोखा
जब टीम मौके पर पहुंची, तो सामने आया एक ऐसा दृश्य, जो पूरे “विकास मॉडल” की पोल खोलने के लिए काफी है।
जहां सीसी रोड बननी थी, वहां: कच्चा रास्ता जस का तस, जगह-जगह गहरे गड्ढे, बरसात में दलदल में तब्दील होने वाली मिट्टी, न कहीं सीमेंट, न गिट्टी, न निर्माण का कोई निशान, यानी सड़क सिर्फ फाइलों में बनी, जमीन पर सिर्फ धोखा खड़ा है।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा: “कागजों में गांव बेच दिया”
ग्रामीण अब खुलकर पंचायत और जिम्मेदार अधिकारियों पर सवाल उठा रहे हैं।
खुशीलाल प्रजापति कहते हैं:
“हमारे घर तक कोई सड़क नहीं आई… न कोई काम हुआ, न कोई सामग्री… पैसा कहां गया, कोई बताने वाला नहीं… सब कागजों में खा गए।”
अनिल कुमार धनक का आरोप:
“पूरा गांव अंधेरे में है… 4-5 लाइट छोड़ दें तो कुछ नहीं… सरपंच-सचिव से बोलो तो सुनवाई नहीं होती।”
गुलजार सिंह कहते हैं:
“पुराने काम को नया दिखाकर पैसा निकाल लिया… गांव में कुछ भी नया नहीं बना।”
महिलाओं की पीड़ा: हर दिन कीचड़ से जंग
गांव की महिलाएं इस कथित भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी शिकार हैं।
पुनिया बाई बताती हैं:
“घुटनों तक कीचड़ में चलना पड़ता है… बच्चों को लेकर निकलना मुश्किल होता है… कोई सुनने वाला नहीं है।”
बरसात में यह रास्ता पूरी तरह दलदल बन जाता है, जहां फिसलने, चोट लगने और दुर्घटना का खतरा हर समय बना रहता है।
सिर्फ सड़क नहीं, पूरा सिस्टम सवालों में
ग्रामीणों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायत में:
विकास कार्यों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी
कागजों में काम दिखाकर भुगतान
योजनाओं का चयनित लाभ वितरण
पात्र परिवारों को योजनाओं से वंचित रखना
जैसे गंभीर आरोप लगातार सामने आ रहे हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे महत्वपूर्ण योजना में भी कई पात्र परिवार आज तक लाभ से वंचित हैं, जबकि कागजों में प्रगति दिखा दी जाती है।
मिलीभगत का शक गहराया, जांच पर टिकी नजर
यह पूरा मामला बिना मिलीभगत के संभव नहीं माना जा रहा।
अब सवाल यह उठता है:
क्या फर्जी माप-तौल के जरिए बिल पास किए गए?
क्या अधिकारियों ने बिना मौके का निरीक्षण किए भुगतान स्वीकृत कर दिया?
क्या पंचायत और सप्लायर के बीच सीधा गठजोड़ था?
क्या यह अकेला मामला है या पूरे क्षेत्र में इसी तरह का खेल चल रहा है?
प्रशासन की प्रतिक्रिया: जांच का आश्वासन
मामले पर बाड़ी जनपद के सीईओ दानिश खान ने कहा कि शिकायत को गंभीरता से लिया गया है और जांच टीम गठित की जा रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
बड़ा सवाल: क्या इस बार सच सामने आएगा?
चारगांव की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां कागजों में विकास की गंगा बहती है और जमीन पर लोग कीचड़ में फंसे रहते हैं।
अगर इस मामले में पारदर्शी जांच और सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घोटाला भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।
निष्कर्ष: कागजी विकास का काला सच
चारगांव आज उस “कागजी विकास” का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है, जहां:
पैसा निकलता है
फाइलें पूरी होती हैं
रिपोर्ट बनती है
लेकिन जमीन पर कुछ नहीं होता
और सबसे बड़ा नुकसान उठाता है—आम ग्रामीण
