संवाददाता: अशोक सोनी। बरेली

रजत विमान में विराजित श्री जी की निकली शोभायात्रा
बरेली । नगर में सोमवार 30 मार्च को सत्य अहिंसा और अपरिग्रह के संदेशवाहक भगवान महावीर स्वामी का 2624 वां जन्म कल्याणक महोत्सव जैन समाज के द्वारा अपार हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाया गया।
इस पावन अवसर पर समूचा नगर महावीर स्वामी के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।
इस दौरान प्रातः जैन समाज के द्वारा प्रभात फेरी निकाली गई वहीं नगर के समस्त जैन मंदिरों पर ध्वजारोहण किया गया।
त्पश्चात प्रातः 8:00 बजे से त्रिशला नन्दन को रजत विमान में विराजित कर भव्य शोभायात्रा निकाली गई । यह शोभायात्रा जैन मंदिर जी से प्रारंभ होकर नगर के मुख्य मार्गो से होते हुए पुनः संत भवन पहुंची।
शोभायात्रा का मार्ग में जगह-जगह भव्य स्वागत किया गया। समाज के लोगों सहित धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों के द्वारा जगह-जगह श्रीजी की आरती उतारी और पूजन किया।
जगह-जैसे रंगोली बनाई गई और शोभायात्रा का स्वागत किया।
शोभा यात्रा समापन के पश्चात मंदिर में श्रीजी का अभिषेक, विशेष पूजन और शान्ति धारा के कार्यक्रम संपन्न हुए। जैन धर्मावलंबियों ने विश्व शांति और लोक कल्याण की मंगल कामना की।
इस संबंध में समाज के वरिष्ठ राजेंद्र जैन ने भगवान महावीर जयंती के संबंध में बताते हुए कहा कि महावीर स्वामी ने अहिंसा को सर्वोच्च धर्म बताया है।
त्रिशला नंदन वीर की जय बोलो महावीर की नारों से गुंजायमान हुआ नगर
यह अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न देने का संदेश देती है।
आज के समय में बढ़ती असहिष्णुता, क्रोध और वैमनस्य के बीच यह सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।
यदि व्यक्ति अपने व्यवहार में करुणा और सहानुभूति को अपनाए, तो पारिवारिक और सामाजिक जीवन में शांति और संतुलन स्थापित हो सकता है-
वहीं उन्होंने कहा कि महावीर स्वामी के अनुसार सत्य केवल बोलने तक सीमित नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारना आवश्यक है।
वर्तमान में जहां दिखावा और असत्य का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, वहां सत्य का पालन व्यक्ति को आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।
सत्यनिष्ठ व्यक्ति समाज में विश्वास का केंद्र बनता है और उसका जीवन अधिक स्पष्ट और संतुलित रहता है।
संयम का तात्पर्य केवल इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना है।
महावीर स्वामी ने ब्रह्मचर्य और अनुशासन को आत्मविकास का आधार माना।
आज के समय में जब व्यक्ति त्वरित सुख के पीछे भागता है, तब संयम उसे धैर्य और विवेक के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने बताया कि आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति अधिक पाने की दौड़ में संतोष को खोता जा रहा है।
महावीर स्वामी का यह सिद्धांत सिखाता है कि सीमित संसाधनों में संतुष्ट रहना ही सच्ची समृद्धि है लेकिन यह न केवल मानसिक शांति देता है, बल्कि प्रकृति के संतुलन दो बनाए रखने में भी सहायक होता है।
महावीर स्वामी का अनेकांतवाद यह सिखाता है कि सत्य एकांगी नहीं होता, बल्कि उसे विभिन्न दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है।
यह सिद्धांत समाज में सहिष्णुता और संवाद की भावना को बढ़ावा देता है। वर्तमान समय में जब मतभेद अक्सर विवाद का कारण बनते हैं, तब अनेकांतवाद परस्पर समझ और सामंजस्य स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वहीं सायंकालीन कार्यक्रम मैं पाठशाला के बच्चों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम और महा आरती का आयोजन किया गया।
