संवाददाता : रितिक जैन । बाड़ी

एमआरपी को ठेंगा, प्रशासन मौन — रायसेन के बाड़ी में शराब माफिया बेलगाम
मध्यप्रदेश सरकार की आबकारी नीति 2026-27, जिसे शराब कारोबार में पारदर्शिता और नियंत्रण के उद्देश्य से लागू किया गया था।
आज बाड़ी क्षेत्र में पूरी तरह विफल होती नजर आ रही है। हालात यह हैं कि यह नीति अब “नियंत्रण” नहीं बल्कि “खुली लूट” का पर्याय बन चुकी है।
ठेकेदारों और अधिकारियों की कथित मिलीभगत के चलते नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, और जिम्मेदार तंत्र मूकदर्शक बना बैठा है।
सरकारी जिम्मेदारी, निजी मुनाफा — जवाबदेही शून्य !
बाड़ी की शराब दुकान इसका जीवंत उदाहरण है, जहां संचालन की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं है।
कभी आबकारी विभाग, तो कभी ठेकेदार के बीच झूलती व्यवस्था अब ‘सोम’ कंपनी के कर्मचारियों के भरोसे चल रही है।
इस स्थिति ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं—जब संचालन निजी हाथों में है, तो नियंत्रण किसका है ? और जब नियंत्रण ही नहीं, तो जवाबदेही किसकी ?
एमआरपी सिर्फ दिखावा, हकीकत में खुलेआम वसूली
शराब की बोतलों पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) अब केवल कागजों तक सीमित रह गया है।
जमीनी हकीकत यह है कि 75 रुपये एमआरपी वाली क्वार्टर बोतल को 100 रुपये में बेचा जा रहा है।
हर बोतल पर 20 से 25 रुपये की अवैध वसूली सीधे उपभोक्ताओं की जेब पर डाका डाल रही है।
गरीब और लत के शिकार लोग मजबूरी में इस लूट को सहने को विवश हैं।
युवाओं को फंसाने की दोहरी चाल !
वीयर कैन और बोतलों की बिक्री में भी चौंकाने वाली रणनीति सामने आई है।
जहां कैन एमआरपी पर उपलब्ध कराकर युवाओं को आकर्षित किया जा रहा है, वहीं बोतलों पर 50 से 60 रुपये तक अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो यह न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि युवाओं को शराब की ओर धकेलने की सुनियोजित चाल भी हो सकती है।
प्रशासन की चुप्पी या मिलीभगत ?
सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर खड़ा हो रहा है। यह पूरा खेल खुलेआम चल रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा पसरा है।
रिपोर्टर द्वारा जब बरेली के आबकारी अधिकारी सुनील जी से मोबाइल पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।
वहीं जिला आबकारी अधिकारी दीपक अवस्थी से भी संपर्क साधने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने भी फोन उठाना जरूरी नहीं समझा।
इस चुप्पी ने संदेह को और गहरा कर दिया है—क्या यह महज लापरवाही है या फिर मौन सहमति ?
जनता के सवाल, सिस्टम बेबस
आज बाड़ी ही नहीं, बल्कि पूरे रायसेन जिले में यह मुद्दा चर्चा का विषय बन चुका है। आमजन पूछ रहा है—
क्या सरकार अपनी ही नीति पर नियंत्रण खो चुकी है?
या फिर अधिकारी और ठेकेदार मिलकर नियमों को ठेंगा दिखा रहे हैं?
अगर अब भी नहीं जागा प्रशासन…
यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह “आबकारी नीति” केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी और जमीनी स्तर पर “लूट नीति” के रूप में ही जानी जाएगी।
अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद प्रशासन हरकत में आता है… या फिर जनता यूं ही लुटती रहेगी।
